बठिंडा किसान मेले में वैज्ञानिक खेती और किसान आय बढ़ाने पर जोर
पीएयू ने किसानों को नई किस्मों, कृषि तकनीकों और जल संरक्षण उपायों की दी जानकारी
लुधियाना/बठिंडा, 25 सितंबर 2026: पंजाब कृषि विश्वविद्यालय (पीएयू) की ओर से चल रही किसान मेलों की श्रृंखला के तहत शुक्रवार को क्षेत्रीय अनुसंधान केंद्र, बठिंडा में किसान मेले का आयोजन किया गया। मेले में किसानों, कृषि वैज्ञानिकों और विशेषज्ञों ने एक मंच पर आकर वैज्ञानिक खेती, आधुनिक कृषि तकनीकों और किसान आय बढ़ाने के विभिन्न पहलुओं पर चर्चा की।

इस किसान मेले का विषय “वैज्ञानिक ढंग अपनाओ, खेती आमदन बढ़ाओ” रहा। मेले का मुख्य उद्देश्य किसानों और कृषि वैज्ञानिकों के बीच सीधा संवाद मजबूत करना तथा किसानों को नई फसल किस्मों, कृषि तकनीकों और उन्नत कृषि पद्धतियों से परिचित करवाना था। इस दौरान किसानों को सलाह दी गई कि वे गैर-अनुशंसित विकल्पों के बजाय पीएयू द्वारा अनुशंसित किस्मों, कृषि आदानों और उत्पादन तकनीकों को अपनाएं, ताकि अनावश्यक खर्च कम करने के साथ प्राकृतिक संसाधनों का संरक्षण और खेती की उत्पादकता व लाभप्रदता बढ़ाई जा सके।
कृषि मंत्री गुरमीत सिंह खुड्डियां रहे मुख्य अतिथि
पंजाब सरकार के कृषि एवं किसान कल्याण, पशुपालन एवं डेयरी विकास, मत्स्य पालन तथा खाद्य प्रसंस्करण मंत्री स. गुरमीत सिंह खुड्डियां किसान मेले के मुख्य अतिथि रहे। पीएयू के कुलपति एवं रजिस्ट्रार श. सुखजीत पाल सिंह, आईएएस ने कार्यक्रम की अध्यक्षता की।
इस अवसर पर स. जग्रूप सिंह गिल, विधायक, बठिंडा (शहरी) तथा स. मोहन सिंह जाखड़, सदस्य, पीएयू बोर्ड ऑफ मैनेजमेंट विशेष अतिथि के रूप में उपस्थित रहे।
मुख्य अतिथि स. गुरमीत सिंह खुड्डियां ने कृषि अनुसंधान और किसान समुदाय के बीच संपर्क को और मजबूत करने की आवश्यकता पर जोर दिया। उन्होंने किसानों तक उन्नत किस्में, तकनीकी जानकारी और व्यावहारिक समाधान पहुंचाने के लिए पीएयू के प्रयासों की सराहना की।
उन्होंने कहा कि बठिंडा क्षेत्र मालवा के कपास पट्टी में महत्वपूर्ण स्थान रखता है और किन्नू उत्पादन के लिए भी जाना जाता है। इसलिए क्षेत्र की स्थानीय जलवायु और कृषि परिस्थितियों के अनुरूप खेती की तकनीकों को अपनाना जरूरी है।
उन्होंने विशेष रूप से पीएयू की अनुशंसित पीबीडी-88 (PBD 88) देसी कपास किस्म की खेती पर जोर दिया। उन्होंने बताया कि यह गैर-झड़ने वाली किस्म है तथा कपास की पत्ती मरोड़ रोग के प्रति प्रतिरोधी होने के साथ अच्छी उपज क्षमता रखती है।
उन्होंने किसानों से सूक्ष्म सिंचाई, उर्वरकों और पानी का संतुलित उपयोग तथा उन्नत कृषि तकनीकों को अपनाने का आह्वान किया, ताकि खेती की लागत कम हो और किसानों को बेहतर आय प्राप्त हो सके।
वैज्ञानिक खेती से लागत कम करने और आय बढ़ाने पर जोर
किसान मेले की अध्यक्षता करते हुए पीएयू के कुलपति एवं रजिस्ट्रार श. सुखजीत पाल सिंह ने कहा कि विश्वविद्यालय का उद्देश्य कृषि अनुसंधान से विकसित समाधानों को सीधे किसानों तक पहुंचाना है।
उन्होंने कहा कि वैज्ञानिक खेती का वास्तविक लाभ तभी है, जब इससे खेती की लागत कम हो, पानी और अन्य कृषि संसाधनों का कुशल उपयोग हो, उत्पादकता बढ़े और किसानों को बेहतर आर्थिक लाभ मिले।
बठिंडा क्षेत्र की दक्षिण-पश्चिमी कृषि पट्टी में विशेष स्थिति को देखते हुए उन्होंने कम वर्षा, अर्ध-शुष्क परिस्थितियों और गर्मियों में अधिक तापमान जैसी चुनौतियों के बीच जल एवं संसाधन संरक्षण आधारित खेती की आवश्यकता पर जोर दिया।
उन्होंने कपास की वैज्ञानिक तरीके से खेती को मजबूत करने के साथ-साथ स्थानीय परिस्थितियों के अनुकूल किन्नू और अन्य बागवानी फसलों सहित उपयुक्त फसल विविधीकरण अपनाने की आवश्यकता बताई। उन्होंने कहा कि खेती का भविष्य वैज्ञानिक ज्ञान और किसानों के व्यावहारिक अनुभव के बेहतर तालमेल में है।
किसानों को पीएयू की सिफारिशों के अनुसार खेती करने की सलाह
विशेष अतिथि स. जग्रूप सिंह गिल ने किसानों से पीएयू की सिफारिशों के आधार पर कृषि संबंधी निर्णय लेने का आग्रह किया। उन्होंने फसल उत्पादन के साथ उपयुक्त फसल विविधीकरण और मूल्य संवर्धन के अवसरों को अपनाने पर भी जोर दिया।
उन्होंने किसानों को कृषि मशीनरी पर उपलब्ध सरकारी सब्सिडी के बारे में भी जानकारी दी।
पीएयू ने विकसित कीं 991 से अधिक फसल किस्में
पीएयू के निदेशक अनुसंधान डॉ. अजमेर सिंह धट्ट ने बताया कि विश्वविद्यालय अब तक 991 से अधिक फसल किस्में विकसित कर चुका है, जिनमें से 250 से अधिक किस्मों को राष्ट्रीय स्तर पर जारी किया जा चुका है।
उन्होंने बताया कि पीएयू की हालिया किस्मों में गेहूं की पीबीडब्ल्यू 887 और पीबीडब्ल्यू 927, गर्मियों की मूंग की एसएमएल 2575, मसूर की एलएल 1613, गैर-जीएम पंजाब राया कैनोला 7, सरसों की पंजाब राया 813 और बरसीम की बीएल 45 शामिल हैं।
इसके अलावा ड्रैगन फ्रूट, आड़ू, नेक्टरीन और केप गूजबेरी जैसी फल फसलों तथा बैंगन, तोरी, लौकी और मटर जैसी सब्जियों की किस्मों पर भी विश्वविद्यालय द्वारा कार्य किया गया है।
डॉ. धट्ट ने बताया कि किसानों की व्यावहारिक जरूरतों को ध्यान में रखते हुए पीएयू की ओर से कीट प्रबंधन, विशेष रूप से गुल्ली-डंडा, सूक्ष्म सिंचाई, गोभी सरसों-तोरिया अंतरफसल प्रणाली और लैक्टिक एसिड बैक्टीरिया आधारित अचार कल्चर जैसी तकनीकों को भी आगे बढ़ाया जा रहा है।
उन्होंने कहा कि कृषि भारतीय अर्थव्यवस्था की रीढ़ है और पंजाब देश के खाद्यान्न उत्पादन में महत्वपूर्ण योगदान देता है। उन्होंने किसानों से फसल अवशेषों को खेतों में बनाए रखने की अपील की, जिससे पौधों के जरूरी पोषक तत्वों और जैविक पदार्थ का संरक्षण किया जा सके।
उन्होंने पीबीडब्ल्यू 826, पीबीडब्ल्यू 872, पीबी चपाती 1 और पीबी आरएस 1 जैसी लोकप्रिय किस्मों का भी उल्लेख किया, जिन्हें किसानों से लगातार अच्छी प्रतिक्रिया मिल रही है।
मिट्टी जांच और जल संरक्षण पर जोर
पीएयू के निदेशक विस्तार शिक्षा डॉ. एम.एस. भुल्लर ने किसानों से किसान मेले में प्रदर्शित तकनीकी जानकारी, उन्नत किस्मों और कृषि तकनीकों का अधिक से अधिक लाभ उठाने की अपील की।
उन्होंने कहा कि वैज्ञानिक कृषि पद्धतियों को अपनाने से अनावश्यक खर्च कम किया जा सकता है, उत्पादकता बढ़ाई जा सकती है और किसानों की आय में सुधार हो सकता है।
उन्होंने मिट्टी की जांच, जल संरक्षण, फसल अवशेषों को उपयोगी संसाधनों में बदलने और एकीकृत कृषि प्रणालियों के माध्यम से फसल विविधीकरण को महत्वपूर्ण बताया।
डॉ. भुल्लर ने कहा कि पंजाब की मिट्टी ने पांच दशकों से अधिक समय तक देश का पेट भरने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। अब समय आ गया है कि पारंपरिक खेती से धीरे-धीरे ज्ञान आधारित और उद्यमशील कृषि की ओर बढ़ा जाए।
उन्होंने किसान मेलों को पीएयू और किसान समुदाय के बीच सीधा संपर्क स्थापित करने का प्रभावी माध्यम बताया।
डिजिटल माध्यमों से भी किसानों तक पहुंचेगी कृषि जानकारी
पीएयू के अतिरिक्त निदेशक संचार एवं एस्टेट अधिकारी डॉ. टी.एस. रियार ने मंच संचालन करते हुए किसानों को विश्वविद्यालय के संचार माध्यमों और सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म से जुड़े रहने के लिए प्रेरित किया।
उन्होंने कहा कि किसान किसान मेले के बाद भी पीएयू की कृषि सलाह, विशेषज्ञ मार्गदर्शन, नई किस्मों, किसान केंद्रित कार्यक्रमों और कृषि क्षेत्र के नवीनतम developments की जानकारी विश्वविद्यालय के डिजिटल माध्यमों से प्राप्त कर सकते हैं।
उन्होंने किसानों से समय पर और प्रमाणिक कृषि जानकारी के लिए पीएयू के आधिकारिक डिजिटल प्लेटफॉर्म को फॉलो करने की अपील की।
दो महत्वपूर्ण प्रकाशन जारी
इस अवसर पर “पैकेज ऑफ प्रैक्टिसेज फॉर रबी क्रॉप्स” तथा “कॉटन लीफ कर्ल वायरस डिजीज: सिम्पटम्स एंड इट्स मैनेजमेंट” नामक दो महत्वपूर्ण प्रकाशनों का विमोचन भी किया गया।
इसके अलावा गांव राई खाना, बठिंडा के सरपंच को सरकार की गांव के तालाबों की स्वच्छता संबंधी पहल के तहत सम्मानित किया गया।
किसान मेले में खेत प्रदर्शन, कृषि प्रदर्शनियां और तकनीकी संवाद प्रमुख आकर्षण रहे। किसानों को उन्नत फसल उत्पादन तकनीकों, कृषि मशीनरी, पानी बचाने वाली तकनीकों, फसल विविधीकरण, बागवानी और मूल्य संवर्धन से संबंधित जानकारी दी गई।
इंस्टीट्यूट ऑफ एग्रीकल्चर, बठिंडा के विद्यार्थियों ने रंगारंग पारंपरिक सांस्कृतिक कार्यक्रम भी प्रस्तुत किया।
वैज्ञानिक निर्णयों से बढ़ेगी खेती की स्थिरता
क्षेत्रीय अनुसंधान केंद्र, बठिंडा के निदेशक डॉ. करमजीत सिंह सेखों ने कहा कि बठिंडा किसान मेले ने यह संदेश मजबूत किया है कि वैज्ञानिक निर्णय, अनुशंसित कृषि तकनीकें और कृषि संसाधनों का कुशल उपयोग किसान आय बढ़ाने के साथ-साथ दीर्घकालिक कृषि स्थिरता के लिए भी आवश्यक हैं।
धन्यवाद प्रस्ताव प्रस्तुत करते हुए उन्होंने कहा कि किसान मेला पंजाब के विभिन्न कृषि क्षेत्रों के किसानों तक पीएयू के अनुसंधान, तकनीकों और विशेषज्ञ मार्गदर्शन को पहुंचाने की विश्वविद्यालय की निरंतर प्रतिबद्धता को दर्शाता है।
